|
गझल |
लेक माझी चालली… |
अरविन्द पोहरकर |
|
गझल |
फिरून यायचे इथे टळेल का कधी? |
मिल्या |
|
गझल |
लागला गळपफास तेव्हा तरतरी श्वासात आली! |
सतीश देवपूरकर |
|
गझल |
माणसांना माणसांचे |
केदार पाटणकर |
|
गझल |
खरा कायदयाने मला फास होता |
मयुरेश साने |
|
गझल |
''वाटत आहे'' |
कैलास |
|
गझललेख |
ज्योत छोटीशी जरी.. रसग्रहण |
केदार पाटणकर |
|
गझल |
भलतीच मर्यादीत ह्यांची झेप आहे |
बेफिकीर |
|
गझल |
एवढे नसते जलद आयुष्य सरण्यासारखे! |
प्रोफेसर |
|
गझललेख |
शे(अ)रो-शायरी, भाग-९ : टूटी है मेरी नींद मगर तुमको इससे क्या |
मानस६ |
|
गझल |
वर्तुळे |
विजय दि. पाटील |
|
गझललेख |
आपले रडणे....एक रसग्रहण |
केदार पाटणकर |
|
गझल |
काय नभाची आहे इच्छा पाहू... |
वैभव देशमुख |
|
गझल |
बोचरे वारे |
विजय दि. पाटील |
|
गझल |
चोर |
कैलास |
|
गझल |
संवेदनशिल विषयांना बाजार बनविले जाते |
शुभानन चिंचकर |
|
गझल |
हुंदका उरातच गोठवायचा आहे |
वैभव वसंतराव कु... |
|
गझल |
पाहिले चालून त्याच्या सोबतीने |
बेफिकीर |
|
गझल |
"दारू" |
कैलास |
|
गझल |
पुढे सरू की जाऊ मागे... |
वैभव देशमुख |
|
गझल |
विषारी केव्हढे वातावरण आहे |
चित्तरंजन भट |
|
गझल |
...टाळतो |
केदार पाटणकर |
|
गझल |
आकडेवारी |
केदार पाटणकर |
|
गझल |
प्रश्न आहे असा.. |
ज्ञानेश. |
|
पृष्ठ |
पान सापडले नाही |
विश्वस्त |