गझल : मी तुझ्या प्रेमात आहे, तू मला ही प्रेम कर......

गझल :  ८


मी  तुझ्या  प्रेमात  आहे, तू  मला  ही  प्रेम  कर
आरसा  आहे  तुझा  मी, तू  मला  ही  प्रेम  कर....१.


जी   व्यथा  मी  रोज  माझ्या  अंतरी  सांभाळतो
आज  माझ्या त्या  व्यथेशी  तू  कसा  ही  खेळ  कर....२.


का  असावी  आज  माझ्या  काळ्जाला  काळ्जी ?
हे  वज़न नाही  गझल  की ! तू  तयाशी  खेळ  क र....३.


ईश्वराची  ही  क्रुपा  की  तू  मला  सांभाळ्ले !
मी  न  त्याचा  की  न  ह्याचा, तू  मला  ही  प्रेम  कर....४.


आज  आहे  मी  जगाच्या  एक  जागी  एकटा
शोध माझा तू  च  घे  रे, तू  मला  ही  प्रेम  कर....५.


` ख़लिश ' - विठ्ठल  घारपुरे / १७-०७-२००९.

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